ज़िक्र ए शहादत के वक़्त रोना कैसा है? - Zikre Shahadat Ke Waqt Rona Kaisa Hai

ज़िक्र ए शहादत के वक़्त रोना कैसा है?
ज़िक्र ए शहादत के वक़्त रोना कैसा है?


Zikre Shahadat Ke Waqt Rona in Hindi


सवाल - ज़िक्र ए शहादत के वक़्त रोना कैसा है?
जवाब - अगर ज़िक्रे शहादत के वक्त अहले बैत से मोहब्बत की वजह से दिल ग़मगीन हो जाए और आंखों से आंसू आ जाए तो यह मोहब्बत की पहचान और जायज़ है, मगर रोने रुलाने और सोग के लिए ज़िक्रे शहादत करना और नोह़ा करना, चीखना चिल्लाना ग्रेबान चाक करना बाल नोचना मुंह या सीने पर हाथ मारना शियों का तरीका है जो बिल्कुल नाजायज़ और गुनाह है।

जैसा कि ह़दीसे पाक में है-
जो मुंह पर तमाचा मारे और ग्रेबान फाड़े और जहलियत का पुकारा पुकारे ( मतलब नोह़ा करे ) तो वह हम में से नहीं ( मतलब हमारे तरीक़े पर नहीं )।
और आला हज़रत रदियल्लाहु तआ़ला अन्हू फरमाते हैं हर साल सोग की तजवीद तो असलन किसी के लिए ह़लाल नहीं। ( फ़तावा रज़विया जिल्द नंबर 24 )


Zikre Shahadat Ke Waqt Rona in Urdu


سوال ۔ ذکرِ شھادت کے وقت رونا کیسا ہے؟
جواب : اگر ذکرِ شھادت کے وقت اہلِ بیت سے محبت کی وجہ سے دل غمگین ہوجائے اور آنکھوں سے آنسو آجائیں تو یہ محبت کی پہچان اور جائز ہے مگر رونے رلانے اور سوگ کے لیے ذکرِ شھادت کرنا اور نوحہ کرنا، چیخنا چلانا، گریبان چاک کرنا، بال نوچنا ، منہ یا سینے پر ہاتھ مارنا شیعوں کا طریقہ ہے جو بالکل ناجائز و گناہ ہے۔
جیسا کہ حدیث مبارکہ میں ہے:
"جو منہ پر طمانچہ مارے اور گریبان پھاڑے اور جاھلیت کا پکارنا پکارے (یعنی نوحہ کرے) تو وہ ہم میں سے نہیں (یعنی ہمارے طریقے پر نہیں)"۔
اور اعلیٰ حضرت رضی اللّٰہ تعالٰی عنہ فرماتے ہیں:
"ہر سال سوگ کی تجدید تو اصلاً (بالکل) کسی کیلیےحلال نہیں" ۔
(فتاویٰ رضویہ جلد24)